भिलाई स्टील प्लांट में उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए नई 'ग्रीन स्टील' तकनीक का सफल परीक्षण
[भारत / छत्तीसगढ़ / दुर्ग] - देश के औद्योगिक विकास के गौरव और स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (SAIL) की सबसे कमाऊ इकाई 'भिलाई स्टील प्लांट' (BSP) ने अपने नाम एक और बड़ी ऐतिहासिक तकनीकी उपलब्धि दर्ज कर ली है। दुर्ग जिले में स्थित इस विशाल एकीकृत इस्पात संयंत्र के अनुसंधान एवं विकास विभाग (R&D) ने प्लांट के ब्लास्ट फर्नेस में कार्बन उत्सर्जन को न्यूनतम स्तर पर लाने और इस्पात उत्पादन की क्षमता को 15% तक बढ़ाने के लिए एक नई 'ग्रीन स्टील' (हरित इस्पात) तकनीक का सफल परीक्षण पूरा कर लिया है। वैश्विक स्तर पर बढ़ते पर्यावरण संकट और कार्बन टैक्स की कड़ाई को देखते हुए, भारतीय इस्पात उद्योग के लिए यह तकनीक एक मील का पत्थर साबित होने वाली है। इस नई पद्धति में पारंपरिक कोकिंग कोल (कोयला) की जगह आंशिक रूप से हाइड्रोजन और नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों का उपयोग किया जाता है, जिससे लोहे के पिघलने की प्रक्रिया के दौरान निकलने वाली हानिकारक कार्बन डाइऑक्साइड गैस की मात्रा में भारी कमी आती है।
भिलाई स्टील प्लांट के मुख्य अधिशासी अधिकारी (CEO) ने इस तकनीकी सफलता पर वैज्ञानिकों और इंजीनियरों की टीम को बधाई देते हुए कहा कि यह परीक्षण न केवल पर्यावरण के अनुकूल है, बल्कि इससे स्टील की गुणवत्ता (टेन्साइल स्ट्रेंथ) में भी उल्लेखनीय सुधार देखा गया है। वर्तमान में भिलाई स्टील प्लांट भारतीय रेलवे के लिए विश्व स्तरीय लंबी रेल पटरियों (Long Rails) का एकमात्र सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता है, और इस नई तकनीक के लागू होने से रेलवे के बुनियादी ढांचे के लिए और अधिक टिकाऊ और जंग-रोधी स्टील का उत्पादन संभव हो सकेगा। प्लांट प्रबंधन ने इस नई तकनीक को चरणबद्ध तरीके से अपने सभी सात ब्लास्ट फर्नेस में लागू करने के लिए करीब 450 करोड़ रुपये का एक विस्तृत निवेश प्लान तैयार किया है, जिसे सेल (SAIL) बोर्ड की मंजूरी के लिए भेजा गया है। इससे न केवल उत्पादन लागत में कमी आएगी बल्कि वैश्विक बाजारों में भिलाई के स्टील की मांग और अधिक बढ़ जाएगी।
दूसरी ओर, प्लांट के इस आधुनिकीकरण अभियान के साथ ही दुर्ग जिला प्रशासन ने भिलाई टाउनशिप और उसके आसपास के औद्योगिक क्षेत्रों में पर्यावरण संतुलन बनाए रखने के लिए एक वृहद 'हरित भिलाई' अभियान की शुरुआत की है। इसके तहत प्लांट के सीएसआर (CSR) फंड के माध्यम से भिलाई और दुर्ग के विभिन्न क्षेत्रों में मियावाकी पद्धति से सघन वनों का विकास किया जा रहा है। प्लांट के भीतर काम करने वाले नियमित और ठेका मजदूरों की सुरक्षा को और अधिक पुख्ता करने के लिए सुरक्षा ऑडिट के नियमों को सख्त कर दिया गया है। केबिन ऑपरेटरों के लिए एआई (AI) आधारित सुरक्षा सेंसर्स लगाए जा रहे हैं जो किसी भी संभावित गैस रिसाव या तकनीकी खराबी की स्थिति में अलार्म बजाकर सिस्टम को स्वतः बंद कर देंगे। श्रमिक यूनियनों ने भी इस नई ग्रीन टेक्नोलॉजी और सुरक्षा उपायों का स्वागत किया है, जिससे भिलाई स्टील प्लांट एक बार फिर देश में सुरक्षित और पर्यावरण-हितैषी भारी उद्योग का एक बेहतरीन मॉडल बनकर सामने आया है।
Reported By The Hdsmit Universal Hearld Desk
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