छत्तीसगढ़ के सूरजपुर जिले में कोयला खदान विस्तार के विरोध में ग्रामीणों और पुलिस के बीच हुई हिंसक झड़प की पूरी ग्राउंड रिपोर्ट। जानें हसदेव अरण्य का पूरा विवाद।

 

  सूरजपुर जिला (हसदेव अरण्य क्षेत्र), छत्तीसगढ़ - छत्तीसगढ़ का सरगुजा और सूरजपुर संभाग एक बार फिर सुलग उठा है। सूरजपुर जिले के सीमावर्ती जंगलों और कोयला खदान प्रभावित क्षेत्रों में पिछले कई दिनों से चल रहा शांतिपूर्ण आंदोलन आज अचानक हिंसक झड़प में बदल गया। स्थानीय ग्रामीणों, पर्यावरण कार्यकर्ताओं और पुलिस बल के बीच हुई इस सीधी भिड़ंत ने राज्य की कानून-व्यवस्था और औद्योगिक नीतियों पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। प्राप्त प्रारंभिक जानकारी के अनुसार, इस झड़प में आधा दर्जन से अधिक पुलिसकर्मी घायल हुए हैं, जबकि दर्जनों ग्रामीणों को भी चोटें आई हैं। पूरे इलाके को छावनी में तब्दील कर दिया गया है, और प्रशासन स्थिति को नियंत्रित करने के लिए हर संभव प्रयास कर रहा है।

इस पूरे विवाद की जड़ें 'हसदेव अरण्य' (Hasdeo Arand) क्षेत्र से जुड़ी हैं, जिसे छत्तीसगढ़ का फेफड़ा कहा जाता है। यह इलाका न केवल जैव विविधता (Biodiversity) से समृद्ध है, बल्कि यह आदिवासियों की संस्कृति, आजीविका और जल स्रोतों का मुख्य आधार भी है। विवाद तब गहराया जब संबंधित माइनिंग कंपनी ने आवंटित कोयला ब्लॉक के विस्तार के लिए नए सिरे से वनों की कटाई और भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू की। स्थानीय आदिवासियों और ग्रामीणों का आरोप है कि इस अधिग्रहण के लिए उनकी ग्राम सभाओं की वैध सहमति नहीं ली गई है। उनका कहना है कि जंगलों के कटने से न केवल पर्यावरण को अपूरणीय क्षति होगी, बल्कि वे अपनी पुश्तैनी जमीन से बेदखल होकर दर-दर की ठोकरें खाने पर मजबूर हो जाएंगे। पिछले कई हफ्तों से ग्रामीण जंगलों को बचाने के लिए पेड़ों से लिपटकर विरोध प्रदर्शन कर रहे थे।
आज सुबह जब जिला प्रशासन की टीम वन विभाग के अमले और भारी पुलिस बल के साथ खदान क्षेत्र के लिए चिन्हित पेड़ों की कटाई और सीमांकन के लिए पहुंची, तो हजारों की संख्या में ग्रामीण पारंपरिक हथियारों, लाठियों और तीरों के साथ रास्ता रोककर खड़े हो गए। पुलिस ने पहले ग्रामीणों को समझाने की कोशिश की और उन्हें क्षेत्र से हटने को कहा। जब ग्रामीण अपनी जमीन से हटने को तैयार नहीं हुए, तो स्थिति को नियंत्रित करने के लिए पुलिस ने बैरिकेडिंग आगे बढ़ाई। इसके बाद दोनों पक्षों में धक्का-मुक्की शुरू हो गई। देखते ही देखते विवाद इतना बढ़ गया कि ग्रामीणों की तरफ से पथराव शुरू हो गया। भीड़ को तितर-बितर करने के लिए पुलिस को लाठीचार्ज करना पड़ा और आंसू गैस के गोले दागने पड़े। इस अफरा-तफरी में कई आंदोलनकारियों को हिरासत में लिया गया है और पूरे घटना स्थल पर धारा 144 लागू कर दी गई है।
इस हिंसक टकराव में घायल हुए पुलिसकर्मियों और ग्रामीणों को तुरंत नजदीकी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) में भर्ती कराया गया है। डॉक्टरों के अनुसार, कुछ पुलिसकर्मियों के सिर और हाथ में गंभीर चोटें आई हैं, लेकिन सभी की स्थिति खतरे से बाहर है। सूरजपुर के पुलिस अधीक्षक (SP) और जिला कलेक्टर स्वयं मौके पर कैंप कर रहे हैं। प्रशासनिक अधिकारियों का कहना है कि वे किसी भी तरह की हिंसा बर्दाश्त नहीं करेंगे और कानून हाथ में लेने वालों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी। दूसरी ओर, स्थानीय आदिवासी संगठनों का कहना है कि पुलिस ने शांतिपूर्ण तरीके से अपनी जमीन मांग रहे निहत्थे ग्रामीणों पर बर्बरतापूर्वक लाठियां चलाई हैं, जिसमें महिलाएं और बुजुर्ग भी शामिल हैं।
सूरजपुर की इस घटना ने रायपुर के राजनीतिक गलियारों में भी हड़कंप मचा दिया है। विपक्षी दलों ने सरकार पर कॉरपोरेट घरानों के दबाव में आदिवासियों के अधिकारों का हनन करने का आरोप लगाया है। वहीं, सत्ता पक्ष का कहना है कि विकास कार्यों और देश की ऊर्जा सुरक्षा के लिए कोयला खनन अनिवार्य है, लेकिन इसे पूरी तरह से नियमानुसार और स्थानीय लोगों के पुनर्वास को सुनिश्चित करते हुए ही आगे बढ़ाया जा रहा है। इस विवाद का सबसे बड़ा सामाजिक प्रभाव यह हो रहा है कि इंसानों और हाथियों के बीच का संघर्ष (Human-Elephant Conflict) इस क्षेत्र में और तेज होने की आशंका है। हसदेव का जंगल हाथियों का मुख्य कॉरिडोर है। अगर यह जंगल उजड़ता है, तो हाथी रिहायशी गांवों की तरफ रुख करेंगे, जिससे भविष्य में जान-माल का नुकसान और बढ़ सकता है। सूरजपुर खदान विवाद केवल एक जिले की समस्या नहीं है, बल्कि यह इस बात का उदाहरण है कि देश में विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाना कितना जटिल होता जा रहा है।
Reported by: The Hdsmit Universal Herald Desk Chhatishgarh

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