संवैधानिक पहचान और सामाजिक सुरक्षा पर साय सरकार का बड़ा फैसला: अवैध और कपटपूर्ण धर्मान्तरण रोकने के लिए 'छत्तीसगढ़ धार्मिक स्वतंत्रता विधेयक' को कैबिनेट की मंजूरी
CHHATTISGARH, RAIPUR
Reported by The HDSMIT Universal Herald
छत्तीसगढ़ के सामाजिक ताने-बाने, समृद्ध सांस्कृतिक पहचान और जनजातीय रीति-रिवाजों की सुरक्षा के लिए राज्य सरकार ने आज एक बड़ा और दूरगामी कानूनी कदम उठाया है। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की अध्यक्षता में महानदी भवन (मंत्रालय) में आयोजित राज्य कैबिनेट की एक अत्यंत महत्वपूर्ण और उच्च स्तरीय बैठक में "छत्तीसगढ़ धार्मिक स्वतंत्रता विधेयक" के नए और कड़े मसौदे को औपचारिक रूप से मंजूरी दे दी गई है। राज्य के विभिन्न हिस्सों, विशेषकर बस्तर और सरगुजा संभाग के आदिवासी अंचलों में पिछले कुछ समय से सामने आ रही अवैध, कपटपूर्ण और प्रलोभन-आधारित धार्मिक धर्मान्तरणों (illegal religious conversions) की गंभीर शिकायतों को स्थायी रूप से रोकने के लिए यह नया और बेहद सख्त कानून लाया जा रहा है।
कैबिनेट द्वारा मंजूर किए गए इस नए विधेयक के कानूनी प्रावधानों के अनुसार, बलपूर्वक, डरा-धमकाकर, धोखे से, वित्तीय या सामाजिक प्रलोभन देकर, या फिर शादी का झांसा देकर किए जाने वाले किसी भी तरह के धार्मिक परिवर्तन को पूरी तरह से गैर-कानूनी, गैर-जमानती और एक गंभीर दंडनीय अपराध की श्रेणी में रखा गया है। विधेयक में यह भी प्रावधान किया गया है कि यदि कोई व्यक्ति या संस्था इस कानून का उल्लंघन करती पाई जाती है, तो उसके खिलाफ भारी वित्तीय जुर्माने के साथ-साथ कई वर्षों के कठोर कारावास की सजा तय की जाएगी। इसके अतिरिक्त, यदि कोई नागरिक अपनी पूर्ण स्वेच्छा और बिना किसी दबाव के अपना धर्म बदलना चाहता है, तो उसे एक निश्चित वैधानिक समय सीमा (न्यूनतम 60 दिन) से पहले जिला मजिस्ट्रेट (DM) के समक्ष एक औपचारिक घोषणा पत्र और आवेदन प्रस्तुत करना अनिवार्य होगा, जिसकी प्रशासनिक जांच के बाद ही इसे वैध माना जाएगा।
कैबिनेट बैठक के बाद मीडिया को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने इस कानून की आवश्यकता पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ की प्राचीन जनजातीय संस्कृति और उनकी पारंपरिक आस्था हमारे राज्य की मूल आत्मा है, और किसी भी बाहरी तत्व को कपटपूर्ण तरीकों से इस सामाजिक समरसता को बिगाड़ने की अनुमति नहीं दी जा सकती। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह कानून किसी भी व्यक्ति की व्यक्तिगत धार्मिक स्वतंत्रता पर रोक नहीं लगाता, बल्कि यह उन संगठित और अवैध तत्वों के खिलाफ एक मजबूत सुरक्षा चक्र है जो भोले-भाले ग्रामीणों को गुमराह करते हैं। इस विधेयक के कैबिनेट से पारित होने के बाद अब इसे आगामी विधानसभा सत्र के पटल पर विधिवत चर्चा और स्थायी कानून बनाने के लिए पेश किया जाएगा।

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