कोरबा में पर्यावरण और जन स्वास्थ्य की रक्षा के लिए महाआंदोलन: दीपका-गेवरा कोयला खदानों के खिलाफ हजारों ग्रामीणों का अनिश्चितकालीन धरना शुरू, सीबीआई जांच की मांग

 CHHATTISGARH, KORBA

Reported by The HDSMIT Universal Herald
छत्तीसगढ़ के 'ऊर्जा मरुस्थल' और देश के प्रमुख औद्योगिक हब कहे जाने वाले कोरबा जिले के अंतर्गत आने वाले दीपका-गेवरा कोयला खदान परिक्षेत्र में आज पर्यावरण प्रदूषण, अवैध फ्लाई एश डंपिंग और स्थानीय आबादी के स्वास्थ्य के साथ हो रहे खिलवाड़ को लेकर एक बहुत बड़ा और अभूतपूर्व जन आंदोलन शुरू हो गया है। "भारतीय जन अधिकार पार्टी छत्तीसगढ़" और विभिन्न स्थानीय सामाजिक-पर्यावरण संगठनों के संयुक्त बैनर तले आयोजित इस विशाल और चरणबद्ध विरोध प्रदर्शन में हजारों की संख्या में स्थानीय ग्रामीण, प्रभावित किसान, महिलाएं और पर्यावरण कार्यकर्ता शामिल हुए। आंदोलनकारियों ने दीपका-गेवरा स्थित एसीबी इंडिया लिमिटेड (ACB India Limited) और साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (SECL) के क्षेत्रीय मुख्य महाप्रबंधक कार्यालयों के ठीक सामने विशाल तंबू गाड़कर अनिश्चितकालीन धरना शुरू कर दिया है।
आंदोलन का नेतृत्व कर रहे वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ताओं और छात्र नेताओं ने आरोप लगाया कि क्षेत्र में स्थापित विभिन्न निजी और सार्वजनिक कोयला वाशरियों, रिजेक्ट कोयला आधारित थर्मल पावर प्लांटों और उनके भारी परिवहन तंत्रों का संचालन पिछले ढाई दशकों (वर्ष 1999 से) से पर्यावरण नियमों को पूरी तरह ताक पर रखकर किया जा रहा है। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के कड़े दिशा-निर्देशों की खुलेआम अनदेखी की जा रही है, जिसके कारण दीपका, गेवरा और कुसमुंडा के दर्जनों गांवों की हवा, पानी और मिट्टी पूरी तरह से विषैली हो चुकी है। खदानों और पावर प्लांटों से निकलने वाली उड़ने वाली राख (Fly Ash) को खुले खेतों, तालाबों और नदियों के किनारे अवैध रूप से डंप किया जा रहा है, जिससे कृषि भूमि बंजर हो रही है और भूजल स्तर प्रदूषित हो रहा है।
प्रदर्शनकारियों ने महामहिम राज्यपाल और माननीय मुख्यमंत्री के नाम जिला प्रशासन को एक सात सूत्रीय विस्तृत ज्ञापन सौंपा है। उनकी मुख्य मांगों में शामिल है कि इन तमाम निजी व बहु-राष्ट्रीय कोयला कंपनियों के पिछले 25 वर्षों के वित्तीय खातों, पर्यावरण स्वीकृतियों और फ्लाई एश के अवैध परिवहन की सघन जांच के लिए केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) या एक उच्च स्तरीय न्यायिक आयोग का गठन किया जाए। इसके साथ ही, उन्होंने प्रभावित गांवों में तत्काल 'मल्टी-एजेंसी फॉरेंसिक और हेल्थ ऑडिट' (Multi-Agency Forensic Audit) कराने और स्थानीय बेरोजगार युवाओं को खदानों में स्थायी रोजगार देने की पुरजोर मांग उठाई है। क्षेत्र में अत्यधिक वायु प्रदूषण के कारण स्थानीय बुजुर्गों और बच्चों में सांस, फेफड़े और त्वचा से जुड़ी गंभीर और जानलेवा बीमारियां महामारी की तरह फैल रही हैं। आंदोलनकारियों ने दो टूक शब्दों में चेतावनी दी है कि जब तक उनकी मांगों पर लिखित प्रशासनिक समझौता नहीं होता, वे खदानों से कोयले के वाणिज्यिक परिवहन और डिस्पैच को पूरी तरह ठप रखेंगे।

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