डिजिटल विभाजन की समाप्ति: बस्तर संभाग के सुदूरवर्ती 195 गाँवों में सक्रिय हुआ मोबाइल नेटवर्क कॉरिडोर
बस्तर, छत्तीसगढ़: छत्तीसगढ़ के सुदूर दक्षिण में स्थित और भौगोलिक व सामरिक रूप से अत्यंत दुर्गम, घने वनांचल वाले बस्तर संभाग के इतिहास में एक नया स्वर्णिम और ऐतिहासिक अध्याय जुड़ गया है। राज्य के दूरसंचार अवसंरचना प्रभाग ने केंद्रीय गृह मंत्रालय और राज्य के विशेष सुरक्षा बलों के साथ मिलकर एक अत्यंत साहसपूर्ण अभियान के अंतर्गत, वर्षों से पूरी तरह से कटे हुए और वामपंथी उग्रवाद (नक्सलवाद) के प्रभाव के कारण अत्यधिक पिछड़े 195 सुदूरवर्ती ग्रामीण क्षेत्रों में आधुनिक और उच्च-क्षमता वाले मोबाइल नेटवर्क टावरों को सफलतापूर्वक स्थापित कर उन्हें पूरी तरह से सक्रिय (लाइव) कर दिया है। भारतवर्ष की स्वतंत्रता के पश्चात के इतिहास में यह प्रथम अवसर है जब इन सघन जंगलों और पहाड़ों के बीच निवास करने वाले हजारों जनजातीय नागरिक सीधे तौर पर वैश्विक दूरसंचार और डिजिटल संचार तंत्र से जुड़ पाए हैं।
इन 195 गाँवों के डिजिटल कॉरिडोर के सक्रिय होने से बस्तर संभाग की सामाजिक और आर्थिक स्थिति में एक क्रांतिकारी और अभूतपूर्व परिवर्तन तत्काल प्रभाव से देखने को मिल रहा है। ऐतिहासिक रूप से, इन क्षेत्रों की स्थानीय जनजातीय आबादी पूरी तरह से मुख्यधारा के विकास से कटी हुई थी। इन गाँवों के निवासियों को अपने बैंक खातों से शासन द्वारा भेजी जाने वाली कल्याणकारी योजनाओं की राशि (सब्सिडी) निकालने, साधारण टेलीफोन कॉल करने या किसी चिकित्सीय आपातकाल की स्थिति में एम्बुलेंस को सूचित करने के लिए भी 20 से 30 किलोमीटर लंबी और खतरनाक पहाड़ी पगडंडियों पर पैदल यात्रा करनी पड़ती थी। परंतु इस मोबाइल नेटवर्क कॉरिडोर के चालू होते ही, अब ये सभी आधुनिक नागरिक सुविधाएं उनके घरों के भीतर ही उपलब्ध हो गई हैं।
इस परियोजना को धरातल पर उतारना दूरसंचार अभियंताओं और निर्माण टीमों के लिए एक अत्यंत चुनौतीपूर्ण, खतरनाक और जीवन को संकट में डालने वाला कार्य था। इस क्षेत्र में सक्रिय उग्रवादी तत्व नहीं चाहते थे कि इन सुदूर गाँवों तक संचार नेटवर्क पहुँचे, क्योंकि डिजिटल कनेक्टिविटी आने से स्थानीय युवाओं में जागरूकता बढ़ती और सुरक्षा बलों की रणनीतिक निगरानी प्रणाली और अधिक मजबूत हो जाती। इस गंभीर चुनौती का सामना करने के लिए, छत्तीसगढ़ सशस्त्र बल और केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) ने संयुक्त रूप से प्रत्येक निर्माण स्थल के समीप अभेद्य और रणनीतिक सुरक्षा शिविर (टैक्टिकल कैम्प्स) स्थापित किए। इन सुरक्षा बलों के कड़े पहरे और चौबीसों घंटे की सुरक्षा निगरानी के साए में, इंजीनियरिंग टीमों ने घने जंगलों के बीच भारी कंक्रीट संरचनाएं खड़ी कीं, विशाल सैटेलाइट डिश एंटीना स्थापित किए और ग्रिड बिजली के अभाव में इन टावरों को निरंतर बिजली आपूर्ति प्रदान करने के लिए विशाल सौर-ऊर्जा पैनल सरणियों (Solar Power Arrays) का निर्माण किया।
इस नेटवर्क के प्रारंभ होने के मात्र कुछ ही दिनों के भीतर इन क्षेत्रों का पूरा परिदृश्य बदल गया है। स्थानीय शासकीय स्कूलों में अब शिक्षक इंटरनेट के माध्यम से डिजिटल लर्निंग टूल्स और ऑनलाइन वीडियो कक्षाओं का उपयोग कर जनजातीय बच्चों को आधुनिक शिक्षा प्रदान कर रहे हैं। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों को सीधे जिला अस्पतालों से टेली-मेडिसिन नेटवर्क के माध्यम से जोड़ दिया गया है, जिससे आपातकालीन स्थितियों में डॉक्टरों से तत्काल परामर्श संभव हो गया है। इसके अतिरिक्त, स्थानीय वनोपज संग्रहकर्ताओं और किसानों को अब अपनी कृषि उपज और महुआ, इमली जैसे वनोपजों के वास्तविक बाजार मूल्यों की जानकारी लाइव इंटरनेट के माध्यम से सीधे प्राप्त हो रही है, जिससे बिचौलियों द्वारा किए जाने वाले उनके आर्थिक शोषण पर पूरी तरह से रोक लगा दी गई है। सुरक्षा विश्लेषकों का मत है कि यह मोबाइल नेटवर्क कॉरिडोर केवल एक तकनीकी बुनियादी ढांचा नहीं है, बल्कि यह बस्तर के जंगलों से नक्सलवाद और पिछड़ेपन को सममूल नष्ट कर विकास की मुख्यधारा को स्थापित करने का राज्य सरकार का सबसे अचूक और शक्तिशाली हथियार साबित होगा।
- रिपोर्ट: द एचडस्मिट यूनिवर्सल डेस्क

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